Tuesday, July 8, 2008
कुछ दूर हमारे साथ चलो हम दिल की कहानी कह देंग़े....
समझे ना जिसे तुम आंखो से वो बात ज़ुबानी कह देंग़े,
फूलो की तरह जब होठो पर इक शोक तबसुम बिखरेगा,
धीरे से तुम्हारे कानो मे इक बात पुरानी कह देंगे,
इज़्हार-ए-वफा तुम क्या समझो इक़रार-ए-वफा तुम क्या जानो,
हम ज़िक्र करेंगे गैरो का और अपनी कहानी कह देंग़े,
मौसम तो बढा ही ज़ालिम है तूफान उठता रहता है,
कुछ लोग मगर इस हलचल को बदमस्त जवानी कह देंग़े,
समझे ना जिसे तुम आंख से वो बात ज़ुबानी कह देंग़े,
कुछ दूर हमारे साथ चलो हम दिल की कहानी कह देंग़े....
Wednesday, October 24, 2007
जाने क्योँ तुम से मिलने कि, आशा कम विश्वाश बहुत है।
सशसा भूली याद तुम्हारी उर्र में आग लगा जाती है।
बिरहा तताप भी मधुर मिलन के सोये मेघ जगा जाती है।
मुझ को आग और पानी में रहने का अभाय्श बहुत है।
जाने क्योँ तुम से मिलने कि, आशा कम विश्वाश बहुत है।
धन्य धन्य मेरी लघुता को, जिसने तुम्हे महान बनाया
धन्य तुमहारी स्नेह क्रिप्नता, जिश्ने मुझे उद्दार बनाया
मेरी अंध भक्ति को केवल इतना मंद प्रकाश बहुत है
जाने क्योँ तुम से मिलने कि, आशा कम विश्वाश बहुत है।
मैं में आँखें खोल देख ली है नादानी उन्माधो कि
मैं नी सुनी और समझी है कठिन कहानी अवसदो कि,
फिर भी जीवन के प्रिसतो में पढ़ने का एतिहाश बहुत है।
जाने क्योँ तुम से मिलने कि, आशा कम विश्वाश बहुत है।
ओह! जीवन के थके पखेरोऊ बढे चलो हिम्मत मत हरो,
पंखो में भविउस बंदी है मत अततेत कि ओहर निहारो ,
क्या चिंता धरती यदि छूटी उड़ने को आकाश बहुत है
जाने क्योँ तुम से मिलने कि, आशा कम विश्वाश बहुत है।
Sunday, October 21, 2007
जीवन की आपाधापी में
जीवन की आपाधापी में कब वक़्त मिला
कुछ देर कहीं पर बैठ कभी यह सोच सकूँ
जो किया, कहा, माना उसमें क्या बुरा भला।
जिस दिन मेरी चेतना जगी मैंने देखा
मैं खड़ा हुआ हूँ इस दुनिया के मेले में,
हर एक यहाँ पर एक भुलाने में भूला
हर एक लगा है अपनी अपनी दे-ले में
कुछ देर रहा हक्का-बक्का, भौचक्का-सा,
आ गया कहाँ, क्या करूँ यहाँ, जाऊँ किस जा?
फिर एक तरफ से आया ही तो धक्का-सा
मैंने भी बहना शुरू किया उस रेले में,
क्या बाहर की ठेला-पेली ही कुछ कम थी,
जो भीतर भी भावों का ऊहापोह मचा,
जो किया, उसी को करने की मजबूरी थी,
जो कहा, वही मन के अंदर से उबल चला,
जीवन की आपाधापी में कब वक़्त मिला
कुछ देर कहीं पर बैठ कभी यह सोच सकूँ
जो किया, कहा, माना उसमें क्या बुरा भला।
मेला जितना भड़कीला रंग-रंगीला था,
मानस के अन्दर उतनी ही कमज़ोरी थी,
जितना ज़्यादा संचित करने की ख़्वाहिश थी,
उतनी ही छोटी अपने कर की झोरी थी,
जितनी ही बिरमे रहने की थी अभिलाषा,
उतना ही रेले तेज ढकेले जाते थे,
क्रय-विक्रय तो ठण्ढे दिल से हो सकता है,
यह तो भागा-भागी की छीना-छोरी थी;
अब मुझसे पूछा जाता है क्या बतलाऊँ
क्या मान अकिंचन बिखराता पथ पर आया,
वह कौन रतन अनमोल मिला ऐसा मुझको,
जिस पर अपना मन प्राण निछावर कर आया,
यह थी तकदीरी बात मुझे गुण दोष न दो
जिसको समझा था सोना, वह मिट्टी निकली,
जिसको समझा था आँसू, वह मोती निकला।
जीवन की आपाधापी में कब वक़्त मिला
कुछ देर कहीं पर बैठ कभी यह सोच सकूँ
जो किया, कहा, माना उसमें क्या बुरा भला।
मैं कितना ही भूलूँ, भटकूँ या भरमाऊँ,
है एक कहीं मंज़िल जो मुझे बुलाती है,
कितने ही मेरे पाँव पड़े ऊँचे-नीचे,
प्रतिपल वह मेरे पास चली ही आती है,
मुझ पर विधि का आभार बहुत-सी बातों का।
पर मैं कृतज्ञ उसका इस पर सबसे ज़्यादा -
नभ ओले बरसाए, धरती शोले उगले,
अनवरत समय की चक्की चलती जाती है,
मैं जहाँ खड़ा था कल उस थल पर आज नहीं,
कल इसी जगह पर पाना मुझको मुश्किल है,
ले मापदंड जिसको परिवर्तित कर देतीं
केवल छूकर ही देश-काल की सीमाएँ
जग दे मुझपर फैसला उसे जैसा भाए
लेकिन मैं तो बेरोक सफ़र में जीवन के
इस एक और पहलू से होकर निकल चला।
जीवन की आपाधापी में कब वक़्त मिला
कुछ देर कहीं पर बैठ कभी यह सोच सकूँ
जो किया, कहा, माना उसमें क्या बुरा भला।
हरीवंश राय बच्चन
Friday, June 29, 2007
हर तरफ़, हर तरह...
बुलबुलों में रहा पिंजरों की तरह,
रास्तों पर चला मंजिलों की तरह,
मैं नशे में भी होश ना खो सका
महफ़िलों को जिया मंदिरों की तरह,
सपने हकीकत सब बेकार थे
इस सजा को जिया शापितों की तरह,
शौक था एक ही बस बगावत का
फ़ौजियों में रहा बागियों की तरह,
नाम था या थी ये सब बदनामियाँ
खबरों में रहा हादसों की तरह,
ठहरे पानी सा ही यूं तो ठहराव था
नफ़रतों में चला पर गोलियों की तरह,
हरेक का यहाँ कोई खरीददार था
मैं फ़ेरियों में बिका फ़ुटकरों की तरह,
इश्क़ को क्यों इबादत कहते हैं लोग
खाइयों में गिरा आशिक़ों की तरह,
दूंद ली भीड़ में भी मैंने तनहाइयां
शादियों में रहा मातमों की तरह,
हार को चूमा हर बार बहुत प्यार से
हौसलों से मिला मुश्किलों की तरह,
दर्द की वजह बस एक इन्तज़ार था
हर घड़ी से मिला दुश्मनों की तरह,
हर मोड़ पर एक ऊंची दीवार थी
झांका दरारों से कनखियों की तरह,
दिल से मिटाया मेरा नाम बार बार
उनके गालों पर रहा सुर्खियों की तरह,
मैं गूंगा था
उन्हे शौक था शोर का
बस बिलखता रहा
जोकरों की तरह,
ये लिखना तो बस एक दोहराव था
बस उन्हीं को लिखा
हर तरफ़, हर तरह...
Saturday, May 26, 2007
क्या बतायें
फिर से दोहरायें वो घड़ी कैसे ?
किसने रस्ते में चाँद रखा था
मुझको ठोकर वहाँ लगी कैसे ?
वक्त पे पाँव कब रखा हमने
जिंदगी मुँह के बल गिरी कैसे ?
आँख तो भर गई थी पानी से
तेरी तसवीर जल गई कैसे ?
हम तो अब याद भी नहीं करते
आपको हिचकी लग गई कैसे ?
गर ये शर्त है
गर ये शर्त -ए -ताल्लुक है कि है हमको जुदा रहना
तो ख्वाबों में भी क्यूँ आओ़ खयालों में भी क्या रहना
शजर जख्मी उम्मीदों के अभी तक लहलहाते हैं
इन्हें पतझड़ के मौसम में भी आता है हरा रहना
पुराने ख्वाब पलकों से झटक दो सोचते क्या हो
मुकद्दर खुश्क पत्तों का, है शाखों से जुदा रहना
अजब क्या है अगर मखमूर तुम पर यूरिश- ए -गम है
हवाओं की तो आदत है चरागों से खफा रहना
किससे माँगें अपनी पहचान
हीय में उपजी,
पलकों में पली,
नक्षत्र सी आँखों केअम्बर में सजी,
पल दो पलपलक दोलों में झूल,
कपोलों में गई जो ढुलक,
मूक, परिचयहीनवेदना नादान,
किससे माँगे अपनी पहचान।
नभ से बिछुड़ी,
धरा पर आ गिरी,
अनजान डगर परजो निकली,
पल दो पलपुष्प दल पर सजी,
अनिल के चल पंखों के साथरज में जा मिली,
निस्तेज, प्राणहीनओस की बूँद नादान,
किससे माँगे अपनी पहचान।
सागर का प्रणय लास,
बेसुध वापिकालगी करने नभ से बात,
पल दो पलका वीचि विलास,
शमित शर नेतोड़ा तभी प्रमाद,
मौन, अस्तित्वहीनलहर नादान,
किससे माँगे अपनी पहचान
सृष्टि ! कहो कैसा यह विधान
देकर एक ही आदि अंत की साँस
तुच्छ किए जो नादान
किससे माँगे अपनी पहचान।
